कुछ
राजनीतिक लोग आजकल सवाल उठा रहे हैं कि जाति जनगणना के आकंड़ों को
सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है. इससे बड़ी जनसंख्या की उपेक्षा हो रही है.
जाति की संख्या के अनुसार बजट में प्रावधान होना चाहिए. उनके विकास पर खर्च
होने चाहिए. मेरी समझ है कि यह सिर्फ वोट हासिल करने का घृणित खेल है.
इन्हें बहुत पहले से पता है कि बिहार में मुसलमानों की आबादी 17 फीसदी है.
लेकिन, उनके लिए बजट में 17 प्रतिशत प्रावधान नहीं किया जाता है क्यों?
इसका जवाब है! 15 साल तो खुद सत्ता में रहे तब भी कुछ नहीं किया!
उनके नए साथी भी दस साल से कुर्सी पर काबिज है! उन्होंने 17 फीसदी आवंटन
क्यों नहीं किया? राजनीतिक हिस्सेदारी में भी सत्रह प्रतिशत हिस्सा होना
चाहिए था. लेकिन, जाति जनगणना के नाम पर आंसू बहा रहे हैं. कभी उनका हिस्सा
देने पर विचार भी नहीं किया.
इतना ही नहीं समाजिक न्याय के तथाकथित मसीहाओं को जवाब देना चाहिए कि उन्होंने बजट में पिछड़े-अति पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक बहुल कोसी क्षेत्र की उपेक्षा क्यों किया? दोनों को यहां से जबर्दस्त समर्थन मिला. फिर भी यह हाल क्यों हुआ? उन्होंने इस क्षेत्र के विकास का प्रयास क्यों किया? किसने उन्हें रोका था? सिर्फ जाति के नाम पर आंसू बहा राजनीतिक रोटी सेंकने का वक्त बीत चुका है. अब इन लोगों की दाल नहीं गलने वाली है!
इतना ही नहीं समाजिक न्याय के तथाकथित मसीहाओं को जवाब देना चाहिए कि उन्होंने बजट में पिछड़े-अति पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक बहुल कोसी क्षेत्र की उपेक्षा क्यों किया? दोनों को यहां से जबर्दस्त समर्थन मिला. फिर भी यह हाल क्यों हुआ? उन्होंने इस क्षेत्र के विकास का प्रयास क्यों किया? किसने उन्हें रोका था? सिर्फ जाति के नाम पर आंसू बहा राजनीतिक रोटी सेंकने का वक्त बीत चुका है. अब इन लोगों की दाल नहीं गलने वाली है!

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